विचार मंथन : चीन की वापसी - सच से दूर या दूर का सच

 


संईया झूठों का बड़ा सरताज निकला


दोस्तों नमस्कार सुबह सुबह दूर कही से एक गाने की आवाज आ रही थी गाने के बोल थे संईया झूठों का बड़ा सरताज निकला दिल तोड चला, मुख मोड़ चला बड़ा धोखेबाज निकला । गाने को सुनकर मन गहन चिंतन में खो गया । आकाश में बादलों की उपस्थित से विचार भी बादलों की तरह उमड़ने व घुमडने लगे और देश के चिंतन पर कलम ने जो लिखा आपको भी पढवाना चाहता हूं। 


हमें खुश होना चाहिए कि चीन ने अपनी सेनाएं दो कि.मी., उस जगह से पीछे हटा ली हैं। जहां पर झड़प हुई थी और हमारे 20जवान शहीद हो गये थे। लेकिन अब सोचने का समय आ गया है और वजह भी साफ है कि जब देश का प्रधान सेवक ही झूठ बोलने लगे तो क्या किया जाए ? सवाल बहुत गम्भीर और चिंता जनक भी है ।


ना तो हमारी सीमा में कोई आया है, ना घुसा है,और ना हमारी किसी पोस्ट पर कब्जा किया तो चीनी अधिकारियों की बात किस विषय पर हो रही थी ?


सर्व दलीय बैठक के बाद जब प्रधान सेवक ने टीवी पर आकर कहा कि ना तो हमारी सीमा में कोई आया है, ना घुसा है,और ना हमारी किसी पोस्ट पर कब्जा किया है । तो उसके बाद लगातार सैन्य अधिकारियों से चीनी अधिकारियों की बात किस विषय पर हो रही थी ? सवाल नं दो किस बात को लेकर हमारे रक्षा मंत्रालय व विदेश मंत्रालयों की बात हो रही थी? तीसरा सवाल किस विषय पर हमारे रक्षा सलाहकार उनके रक्षा सलाहकार से बात करने गए थे?


क्यो सीमा पर आम दिनों से अधिक सैनिक को तैनात किया जा रहा था? क्यो सीमा पर हमारे जंगी जहाज़ों को तैनात कर कहा जा रहा था। हमारी वायुसेना हर बात के लिए सीमा पर तैयार खड़ी है? क्यो मीडिया युद्ध के हालातो की समीक्षा करते हुए चीन को युद्ध में टीवी पर ही बैठे बैठे हरा रहा था?


क्यो रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय व पीएम के बयानों में विरोधाभास था? जब कि सीमा में कोई घुसकर ही नहीं बैठा था ? तो ये जो खबर कल आई कि चीन ने अपनी सेनाएं दो किलोमीटर पीछे हटा ली है और वहां से अपने स्थाई निर्माण भी गिरा दिए । तो फिर क्या ये माना जाए कि चीन अपनी ही सीमा में पीछे हटा है ? या फिर वो अन्दर था ?   



जी नहीं ऐसा नहीं चीन उस क्षेत्र में पीछे हटा हैं जो क्षेत्र दोनों देशों की सीमाओं के बीच है ।जिसको चीन विवादित बताता है जबकि वास्तव में वो हमारा क्षेत्र है।     जब हमारे सैनिकों के साथ खूनी झड़प हुई थी तब भी दो दिन पहले ये खबर आई थी कि चीन ने अपनी सेना दो कि मी पीछे हटाली है । उसी को चैक करने जब हमारे सैनिक गए थे, तभी ये खूनी संघर्ष हुआ था । और तभी ये ब्यान आया था कि ना कोई सीमा में आया,ना घुसा,और ना कब्जा किया, जबकि विपक्ष व मीडिया में ये बातें लगातार आती रही कि चीन लद्दाख में घुस आया है और कुछ स्थाई निर्माण भी कर लिया है । तो निश्चित ये वो भारतीय जगह है जहां से चीन पीछे हटा है। और अपने निर्माण गिराए हैं । तो ये साफ हो जाता है कि दुश्मन हमारी सीमा में घुसा था । तो पीएम ने क्यो ऐसा कहा? क्या वो इतना भी नहीं समझ नहीं सकते थे कि कल चीन इसी ब्यान का फायदा अंर्तराष्ट्रीय मंच पर उठा लेगा ? और क्यो आज़ तक पीएम के मुंह से एक बार भी चीन का नाम नहीं निकला?


खैर हमारे पीएम ने ऐसा लालकिले की प्राचीर से भी किया । अंर्तराष्ट्रीय मंच पर भी किया ।और यदि उनके 14 से पहले के भाषणों को उनको दुबारा सुनवाया जाए तो शायद वो सुन नहीं पाएंगे जैसे मैं देश नहीं बिकने दूंगा, रुपया गिरता है तो सरकार की वजह से, पैट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो ये केन्द्र सरकार की नाकामी हैं, महंगाई कम करेंगे, 100 स्मार्ट सिटी बनाएंगे, काशी क्योटो बना दूंगा, गंगा साफ हो जाएगी, भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा,हर हाथ को काम मिलेगा, किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी, हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देंगे,15 लाख तो चलो जुमला मान लेते हैं। आदि आदि यानी अगर भावार्थ निकला तो कहा जा सकता है कि दैहिक, दैविक, भौतिक, ताप कुछ नहीं बचेगा बस मुझे 60 महीने के लिए पीएम बना दो । राम राज्य की स्थापना कर दूंगा ।


        अब सच्चाई भीआपके सामने है कि आज देश किस हाल में पहुंचा दिया है। इस पर भी कहा जाता है कि आल इज़ वैल ।वाह सहाब वाह ! सर सच्चाई समझिए,हवा से नीचे उतरिए, जनता ने आपको काम की बात सुनने को चुना था मन की बात सुनने को नहीं । हमारे पीएसयू बेचने को नहीं बचाने को चुना था। अगर ये पहले बिके! और अब भी बिक रहे हैं !और आगे भी बिकेंगे? तो ये देश नहीं तो क्या बिक रहा है ? 
         मैं फिर निवेदन करता हूं हमे मुफ्त में अनाज नहीं रोजगार चाहिए ताकि हम कमाकर खाएं ।ना कि देश के संसाधनों को बेचकर मुफ्त में बैठकर खाएं । जब सबकुछ बिक जाएगा तो फिर क्या बेचेंगे? और फिर खाएंगे कहां से ? दोस्तों देश के जो पीएसयू बेचे जा रहे है। इन्हें ना बेचने की अपील सबको करनी चाहिए । नहीं तो रेल जैसा गरीबों के लिए चलने का ये साधन भी जनता से छीन लिया जाएगा ।इस्ट इंडिया कम्पनी ने भी रोजगार करने के नाम पर देश को धीरे धीरे गुलाम बना लिया था। और एक तरफ जहां देश को लूटा, तो दूसरी तरफ आम जनता पर कितने अत्याचार किए ये सुनकर भी रुह कांपने लगती है । सरकार से निवेदन है कि देश की पीएसयू ना बेचें जाए हम सब इतने देश भक्त हैं कि इन संस्थाओं को बचाने के लिए दिन रात कम से कम वेतन पर भी देश के लिए काम करने को तैयार हैं ।लेकिन आपको सत्य बोलना होगा कि इन सबकी ये हालत कैसे हुई? आपने पिछले पांच 6 सालों में इन्हें बचाने के क्या प्रयास किए ? गाने सुनने के बाद आप भी कभी कभी कुछ सोच लिया करो भाईयों, बहनों, मित्रों। जयहिंद -  नरोत्तम शर्मा


लेखक - वरिष्ठ स्तम्भकार है